Wednesday, September 22, 2021
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Gita puran

राजा जनक महर्षि अष्टावक्र से पूछते हैं कि मनुष्य को आत्म-ज्ञान, संसार से मुक्ति और वैराग्य की प्राप्ति कैसे होती है | संसार में चार प्रकार के मनुष्य होते हैं ज्ञानी, मुमुक्षु, अज्ञानी और मूढ़, जो आत्मानंद में आनंदित, संसय और विपर्य से रहित होता है वही ज्ञानी होता है || 1 || हे राजन ! यदि तुम संसार से मुक्ति चाहते हो तो अपनी ज्ञानेन्द्रियों के विषय और बस्तुओ के भोग विलास की इच्छा को अपने मन से विष की भांति त्याग दो, जिस तरह विष के खा लेने से मनुष्य म्रत्यु को प्राप्त होता है उसी तरह भोग विलास से मनुष्य संसार रूपी म्रत्यु जन्म मरण के चक्र में फँस जाता है, विषयों के अधिक भोगने से शरीर में रोग और बुद्धि मलिन हो जाती है विवेक खो जाता है और सार एवं आसार वस्तुओ का ज्ञान नहीं रहता || 2 || विषयों के त्यागने से शरीर नहीं चल सकता और बड़े बड़े ऋषियों ने भी इसका त्याग नहीं किया है और आत्मज्ञान प्राप्त किया है फिर आप हमसे इन्हें त्यागने को क्यों कहते हैं | राजन तुम सत्य कहते हो, विषयों के त्याग का मतलब उनमें आसक्ति का त्याग है और उनके न मिलने पर व्याकुल ना होना यही विषयों का त्याग है, अपने प्रारब्ध से प्राप्त भोगो से संतुष्ट होना और उनकी प्राप्ति के लिए प्रयास ना करना इसी का नाम वैयाग्य है || 3 || राजन, तुम न तो प्रथ्वी हो और न जल, न ही अग्नि हो न ही वायु और ना ही आकाश और इन पांचो तत्त्वों से बना ये शरीर भी तुम न हो, ये शरीर प्रति क्षण बदलता है अपनी मुक्ति के लिए चैतन्य रूप आत्मा को जानो || 4 || जब तुम शरीर से आत्मा को प्रथक करके अपने आत्मा में चित्त को स्थिर करके स्थिर हो जाओगे तब तुम तत्काल ही शान्ति और मुक्ति को प्राप्त हो जाओगे, जब तक परस्पर अध्यास का नास नहीं होता तब तक तुम बंधन में हो, अध्यास के नास होते ही तुम्हे मुक्ति प्राप्त हो जायेगी || 5 || तुम ब्राह्मण और सभी जातियों और आश्रमों से अलग, दिखाई न देने वाले हो, स्वयं को असंग और निराकार मानकर सुखी हो, आत्मा ही सब कुछ है वह किसी से सम्बद्ध नहीं उस निराकार सत्य को पहिचानो || 6 || धर्म और अधर्म मन की संतान हैं, तुम ना कर्ता हो और ना ही भोक्ता, तुम हमेशा मुक्त हो, तुम आत्मा हो और ये कर्ता या भोक्ता नहीं होती ये हमेशा मुक्त होती है, जब तुम स्वयं को शरीर से मुक्त करके स्वयं को आत्मा मान लोगे तो हमेशा के लिए मुक्त हो जाओगे || 7 || तू ही सबका द्रष्टा है और हमेशा मुक्त रहता है, लेकिन जब तू स्वयं को द्रष्टा ना मानकर दूसरे को द्रष्टा मानता है तब सांसारिक बन्धनों में फंसता है, मनुष्य ही द्रष्टा, आत्मा और परमात्मा है जो इसे जान लेता है वह मुक्त हो जाता है || 8 || मैं कर्ता हूँ इस अहंकार रुपी लिपटे काले सर्प ने तुझे डसा हुआ है, मैं कर्ता नहीं हूँ यह विश्वास करके तुम सुखी हो, जब तुम ये विश्वास करते हो कि मैं कर्ता हूँ तभी जन्म मरण के चक्र में फंसते हो || 9 || मैं एक विशुद्ध बोध हूँ एसा निश्चय कर उसमें गहन अज्ञान को नष्ट कर, जब तू एसा निश्चय करेगा तो इसी निश्चय रुपी अग्नि में तेरा अज्ञान जलकर नष्ट हो जाएगा || 10 || संसार रस्सी में कल्पित सर्प की तरह प्रतीत होता है, वस्तुतः तुम बोध हो, आनंद के लिए स्वयं को विशुद्ध बोध मानते हुए सुखमय विचरण कर || 11 || जब तुम स्वयं को मुक्त भाव मानते हो तब मुक्त हो जाते हो और जब बंध भाव मानते हो तो बंध जाते हो || 12 || आत्मा एक, विराट, पूर्ण, क्रियाहीन, असंग निस्पृह और शांत है लेकिन भ्रम के कारण ये सांसारिक प्रतीत होती है, शरीर की क्रियाए और शरीर सांसारिक है आत्मा क्रिया, भोग-विलास से मुक्त है इच्छा रहित है || 13 || तुम द्रढ होकर विशुद्ध बोध और आत्मा का चिंतन करो, और इस भ्रम में मत पढो कि तुम आभावान और तेजोमय हो इस तरह के विचारों को अपने अन्दर और बाहर जगह मत दो, इस तरह के अभिमानी जीव का पतन निश्चित है || 14 || तुम चिरकाल से देहाभिमान के पाश से आबद्ध हो, अपने इस बंधन को मैं बोध हूँ के ज्ञान से काटो, देहाभिमान तुम्हें देह तक सीमित कर आत्मा के संबंध को विलग कर देता है || 15 || तुम ये याद रखो कि तुम बोध, साक्षी, निसंग, निष्क्रिय स्वयं प्रकाश और आत्मा हो इसलिए इनकी प्राप्ति के लिए समाधि का अनुष्ठान मत करो ये अनुष्ठान ही तुम्हारे बंधन हैं || 16 || सम्पूर्ण विश्व तुझमें व्याप्त है और तू विश्व में, विश्व की अपनी सत्ता नहीं है ये केवल तेरे संकल्प से उत्त्पन्न हुआ है और तेरे संकल्प से ये निवृत हो जाएगा, तू चित्त को छल-प्रपंच और छुद्र प्रवत्तियो से दूर रख कर अपने शुद्ध स्वरुप में स्थित हो जा || 17 || तू निरपेक्ष है, तेरा न कोई आकर है, स्व-निर्भर है, शीतल है, अगाध बुद्धि संपन्न है, क्षुब्दहीन है | भूख, प्यास शोक मोह, जन्म, मरण ये छह स्थूल शरीर के धर्म हैं तुझ आत्मा के नहीं, तू सूक्ष्म शरीर और और स्थूल शरीर से परे इन दोनो का द्रष्टा और निर्विकार, सच्चिदानंद रूप है || 18 || साकार क्षणभंगुर है नश्वर है, निराकार निश्चल, नित्य, विराट और सर्वव्याप्त है, शरीर शाकार और अल्पजीवी है, साकार को मिथ्या जान जो इसे समझ लेता है वह मुक्त हो जाता है || 19 || जिसप्रकार दर्पण में प्रतिबिंबित रूप का अन्दर-बाहर अस्तित्व है पर स्वरुप से सत्य नहीं है उसी प्रकार शरीर में भी आत्मा अन्दर बाहर व्याप्त है और सत्य प्रतीत होती है || 20 || जिस प्रकार आकाश सर्वत्र और प्रत्येक घट के अन्दर व्याप्त है उसी प्रकार शाश्वत परमात्मा तेरे अन्दर व्याप्त है इसे अपने से अलग न मानकर ब्रह्मस्वरूप हो जा || 21 ||

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